जिंदगी से बडी सजा ही नहीं
और क्या जुल्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बंट गया हूं मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
सच घटे या बढे तो सच ना रहे
झूठ की तो कोई इम्तिहां ही नहीं
जड दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नहीं
कृष्णबिहारी नूर.
Thursday, April 20, 2006
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