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ग़ज़ल की दुनिया में....
Friday, April 07, 2006
गजल की दुनिया में
मुस्कुराकर मिला करो हमसे
कुछ कहा और सुना करो हमसे
बात करने से बात बढती है
रोज बाते किया करो हमसे
दुश्मनी से मिलेगा क्या तुमको
दोस्त बनकर रहा करो हमसे
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Kailash Mohankar
Nagpur, Maharashtra, India
I'm very calm and simple. I'll not say that I'm perfect, I would like to improve myself. I never get angry.
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►
2009
(25)
►
November
(5)
देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह
झुकी झुकी सी नज़र बेक़रार है कि नहीं
तिरे इश्क़ की इंतहा चाहता हूँ
►
October
(11)
ये दिन बहार के अब के भी रास न आ सके
आदमी आदमी से मिलता है
असर उसको ज़रा नहीं होता
वो अपने चेहरे में सौ अफ़ताब रखते हैं
कोई उम्मीद बर नहीं आती
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
दर्द अपनाता है पराये कौन
इस से पहले के बेवफ़ा हो जाये
आ भी जाओ की ज़िंदगी कम है
►
September
(4)
सज़ा का हाल सुनाये जज़ा की बात करें
ज़िंदगी तूने लहू लेके दिया कुछ भी नहीं
उम्र जलवों में बसर हो ज़रूरी तो नहीं
कोई चेहरा हुआ रोशन न उजागर आंखें
►
August
(5)
कच्ची दीवार हूं
यूं तेरी रहगुज़र से दिवानावार गुज़रे
हुस्न जब मेहेरबां हो तो क्या कीजिये
ऐ मोहब्बत
राक्षस था, न खुदा था पहले
▼
2006
(26)
►
November
(3)
हम तो बचपन में भी अकेले थे
लगता नहीं है जी मेरा उजडे दयार में
पत्थर के ख़ुदा वहां भी पाये
►
October
(1)
तू कही भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है
►
September
(4)
जब किसी से
मुझे फिर वही याद
अपने होठों पर सजाना चाहता हूं
पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
►
July
(9)
दुनिया जिसे कहते हैं
दिन कुछ ऐसे गुजारता हैं कोई
बदला ना अपने आपको
कल चौदवी की रात थी
दुनिया के हादसों से तुने मुझे बचा के
गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं
दिल के दीवारों दर पे
मैं होश में था
▼
April
(9)
कितनी पलकों की नमी मांगके लाई होगी
जब कभी तेरा नाम लेते है
पूरा दुख और आधा चांद
जिंदगी से बडी सजा ही नहीं
झूम ले हस बोल ले
तुम सरे आम
कोई पत्ता हिले
घर से निकले
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