Tuesday, November 07, 2006

हम तो बचपन में भी अकेले थे
सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे

एक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
एक तरफ़ आंसूओं के रेले थे

थी सजी हसरतें दूकानों पर
ज़िंदगी के अजीब मेले थे

आज ज़हनों दिल भुखे मरते हैं
उन दिनों फ़ाके भी हम ने झेले हैं

खुदकशी क्या ग़मों हल बनती
मौत के अपने भी सौ झमेले हैं
जावेद अख्तर

Monday, November 06, 2006

लगता नहीं है जी मेरा उजडे दयार में
किस की बनी है आलम-ए-नापायेदार में

कह दो इन हसरतों से कही और जा बसे
इतनी जगह कहां हैं दिल-ए-दागदार में

उम्र-ए-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन
दो आरज़ू में कट गये दो इन्तज़ार में

कितना है बद नसीब "ज़फ़र" दफ़्न के लिये
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए- यार में
बहादुरशहा ज़फ़र
पत्थर के ख़ुदा वहां भी पाये
हम चांद से आज लौट आये

दिवारें तो हर तरफ खडी हैं
क्या हो गया मेहरबां साये

जंगल की हवायें आ रही हैं
कागज़ का ये शहर उड ना जाये

सहरा सहरा लहू के खेमे
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आये.
क़ैफ़ी आज़मी

Sunday, October 08, 2006

तू कही भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है

तू कही भी रहे सर पर तेरे इल्ज़ाम तो है
तेरे हाथों की लकिरों में मेरा नाम तो है

मुझको तू अपना बना या न बना तेरी खुशी
तू ज़माने में मेरे नाम से बदनाम तो है

मेरे हिस्से में कोई ज़ाम ना आया ना सही
तेरी महफ़िल में मेरे नाम कोई शाम तो है

देखकर लोग मुझे नाम तेरा लेते है
इसपे मैं खुश हूं मोहब्बत का ये अंजाम तो है

वो सितमगर ही सही देखके उसको साबिर
शुक्र है इस दिल-ए-बीमार को आराम तो है

Thursday, September 28, 2006

जब किसी से

जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना

यूं उजालों से वास्ता रखना
शमा के पास ही हवा रखना

घर की तामिर चाहे जैसी हो
इसमें रोने की कुछ जगह रखना

मिलना जुलना जहा ज़रूरी हो
मिलने ज़ुलने का हौसला रखना

निदा फ़ाज़ली.

मुझे फिर वही याद

मुझे फिर वही याद आने लगे है
जिन्हे भुलाने में ज़माने लगे है

सुना है हमे वो भुलाने लगे है
तो क्या हम उन्हे याद आने लगे है?

ये कहना है उनसे मोहब्बत है मुझको
ये कहने में उनसे ज़माने लगे है

क़यामत यकिनन क़रीब आ गई है
'ख़ुमार' अब तो मस्जिद में जाने लगे है

ख़ुमार बाराबंकवी.

दिल में एक लहर सी

दिल में एक लहर सी उठी है अभी
कोई ताजा हवा चली है अभी

शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दिवार सी गिरी है अभी

कुछ तो नाजूक मिजाज है हम भी
और ये चोट भी नई है अभी

याद के बेनिशा जंजीरों से
तेरी आवाज आ रही है अभी

शहर की बेचिराग गलियों में
ज़िंदगी तुझको ढूंढती है अभी

भरी दुनिया में जी नही लगता
जाने किस चीज की कमी है अभी

नसीर काज़मी.

Saturday, September 09, 2006

अपने होठों पर सजाना चाहता हूं
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूं

कोई आसू तेरे दामन पर गिराकर
बूंद को मोती बनाना चाहता हूं

थक गया मैं करते करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूं

छा रहा हैं सारी बस्ती में अंधेरा
रोशनी को घर जलाना चाहता हूं

आखरी हिचकी तेरे शानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूं

कतील शिफ़ाई.
पत्थर सुलग रहे थे कोई नक्श-ए-पा न था
हम उस तरफ़ चले थे जिधर रास्ता न था

परछाईयों के शहर की तनहाईयां न पुछ
अपना शरीक-ए-ग़म कोई अपने सिवा न था

यूं देखती हैं गुमशुदा लम्हों के मोड से
इस जिंदगी से जैसे कोई वास्ता न था

चेहरों पे जम गई थी ख़यालों की उलझनें
लफ़्जों की जुस्तजु में कोई बोलता न था

मुमताज राशीद.

Saturday, July 15, 2006

दुनिया जिसे कहते हैं

दुनिया जिसे कहते हैं जादू का ख़िलौना हैं
मिल जाये तो मिट्टी हैं खो जाये तो सोना है

अच्छा सा कोई मौसम तनहा सा कोई आलम
हर वक़्त आये रोना तो बेकार का रोना हैं

बरसात का बादल तो दिवाना हैं क्या जाने
किस राह से बचना हैं किस छत को भिगौना हैं

ग़म हो कि ख़ुशी दोनो कुछ देर के साथी हैं
फिर रास्ता ही रास्ता हैं हंसना हैं रोना हैं
निदा फ़ाज़ली
दिन कुछ ऐसे गुजारता हैं कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

दिल में कुछ यूं संभालता हैं ग़म
जैसे जेवर संभालता हैं कोई

आईना देखकर तसल्ली हुई
हम को इस घर में पहचानता हैं कोई

दूर से गुंजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
गुलज़ार

बदला ना अपने आपको

बदला ना अपने आपको जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर अज़नबी रहे

दुनिया ना जीत पाओ तो हारो ना ख़ुद को तुम
थोडी बहुत तो ज़हान में नाराज़गी रहे

अपनी तरहा सभी को किसी की तलाश थी
हम जिसके भी क़रीब रहे दूर ही रहे

गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले है फूल वो डाली हरी रहे
निदा फ़ाज़ली

कल चौदवी की रात थी

कल चौदवी की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा

हम भी वही मौजुद थे हम से भी सब पूछा किये
हम हंस दिये, हम चुप रहे,मंजूर था पर्दा तेरा

इस शहर में किससे मिले, हम से तो छूटी महफ़िले
हर शख्स तेरा नाम ले,हर शख्स दिवाना तेरा

कुचे को तेरे छोडकर जोगी ही बन जाये मगर
ज़ंगल तेरे, परबत तेरे,बस्ती तेरी,चेहरा तेरा

बेदर्द सुनी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी गज़ल
आशिक़ तेरा, रूसवा तेरा,शायर तेरा,इंशा तेरा
इब्ने इंशा .

Thursday, July 06, 2006

दुनिया के हादसों से तुने मुझे बचा के
बेमौत मार डाला एहसां जता जता के.

तेरा चमकते सूरज एहसान मैं न लूंगा
कर लूंगा मैं उजाला खुद अपना घर जला के.

मैं टूट भी गया तो मुझमें चमक रहेगी
आईना पत्थरों से कहता है मुस्कुरा के.

तुझसे बिछड के आलम में हम जी नही सकेंगे
देखो दगा ना देना अपना मुझे बना के.
गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी

अपने गम को गीत बनाकर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी

शहर में गलीयों गलीयों जिसका चर्चा है
वो अफ़साना तेरा भी है, मेरा भी

तू मुझको और मैं तुझको समझाये क्या
दिल दिवाना तेरा भी है, मेरा भी

मैखाने की बात न कर मुझसे वाईज़
आना जाना तेरा भी है, मेरा भी

शाहिद कबीर.

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं

तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता हैं
तेरे आगे चांद पुराना लगता हैं

तिरछे तिरछे तीर नजर के चलते हैं
सीधा सीधा दिल पे निशाना लगता हैं

आग का क्या हैं पल दो पल में लगती हैं
बुझते बुझते एक ज़माना लगता हैं

सच तो ये हैं फूल का दिल भी छल्ली हैं
हसता चेहरा एक बहाना लगता हैं

कैफ़ भोपाली

दिल के दीवारों दर पे

दिल के दीवारों दर पे क्या देखा
बस तेरा नाम ही लिखा देखा

तेरी आखों में हमने क्या देखा
कभी कातिल कभी खुदा देखा

अपनी सुरत लगी पराई सी
जब कभी हमने आईना देखा

हाय अंदाज तेरे रूकने का
वक्त को भी रूका रूका देखा

तेरे जाने में और आने में
हमने सदियों का फ़ासला देखा

फिर ना आया खयाल जन्नत का
जब तेरे घर का रास्ता देखा

सुदर्शन फ़ाकिर

मैं होश में था

मैं होश में था तो फिर उसपे मर गया कैसे
ये जहर मेरे लहू में उतर गया कैसे

कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुजर गया कैसे

जरूर उसके तसव्वुर की राहत होगी
नशे में था तो मैं अपने ही घर गया कैसे

जिसे भुलाये कई साल हो गये कलीम
मैं आज उसकी गली से गुजर गया कैसे

कलीम कंधपुरी