Sunday, April 16, 2006

कोई पत्ता हिले

कोई पत्ता हिले हवा तो चले
कौन अपना है ये पता तो

चले तू सितम से न हाथ अभी
और कुछ दिन ये सिलसिला तो चले

मंजिले खुद करीब आयेंगी
ये अजिजानो का काफ़िला तो चले

शहर हो गाव हो या हो घर अपना
आबुदाना ही उठ गया तो चले

हर किसी से मिला करो ए जफ़र
कौन कैसा है कुछ पता तो चले

जफ़र अली.

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