दिन कुछ ऐसे गुजारता हैं कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई
दिल में कुछ यूं संभालता हैं ग़म
जैसे जेवर संभालता हैं कोई
आईना देखकर तसल्ली हुई
हम को इस घर में पहचानता हैं कोई
दूर से गुंजते हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई
गुलज़ार
Sunday, July 16, 2006
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