Friday, July 07, 2006

गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी

गम का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी

अपने गम को गीत बनाकर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी

शहर में गलीयों गलीयों जिसका चर्चा है
वो अफ़साना तेरा भी है, मेरा भी

तू मुझको और मैं तुझको समझाये क्या
दिल दिवाना तेरा भी है, मेरा भी

मैखाने की बात न कर मुझसे वाईज़
आना जाना तेरा भी है, मेरा भी

शाहिद कबीर.

1 comments:

DR PRABHAT TANDON said...

भाई कैलाश जी ,मजा आ गया, आप तो हमारी बिरादरी वाले निकले यानी जगजीत के मुरीद्। और भी लिखते रहये।
प्रभात
गजलों की दुनिया से- www.drprabhatlkw.wordpress.com

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