कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मु'अय्यन है
नींद क्यों रात भर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती
जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद
पर तबीयत इधर नहीं आती
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती
क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती
दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता
बू-ए-चारागर नहीं आती
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुमको मगर नहीं आती
ग़ालिब
उर्दु साहित्य में ग़ज़लों का अपना एक अलग ही महत्त्व हैं। ग़ज़लें जीवन के हर पहलू को स्पर्श करती आई है। चाहे वो ख़ुशी हो या ग़म, प्यार हो या शिकवा गिला, यारी हो या दुश्मनी, जीवन के हर भाव को अपने शब्दों में बयाँ करती है ग़ज़लें। यहाँ उर्दु तथा हिन्दी के कुछ जाने माने साहित्यकारों की रचनाओं को आप तक पहुँचाने कि एक कोशिश करना चाह रहा हूँ। आशा है आप इसे बढ़ाने में अपनी राय एवं अपना योगदान ज़रूर देंगे।
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
दिल में इक लहर सी उठी है अभी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी
शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी
कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी
याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी
शहर की बेचराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझ को ढूँढती है अभी
सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी
वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी
नासिर काज़मी
कोई ताज़ा हवा चली है अभी
शोर बरपा है ख़ाना-ए-दिल में
कोई दीवार सी गिरी है अभी
कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी
भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी
तू शरीक-ए-सुख़न नहीं है तो क्या
हम-सुख़न तेरी ख़ामोशी है अभी
याद के बे-निशाँ जज़ीरों से
तेरी आवाज़ आ रही है अभी
शहर की बेचराग़ गलियों में
ज़िन्दगी तुझ को ढूँढती है अभी
सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी
तुम तो यारो अभी से उठ बैठे
शहर में रात जागती है अभी
वक़्त अच्छा भी आयेगा 'नासिर'
ग़म न कर ज़िन्दगी पड़ी है अभी
नासिर काज़मी
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
नसीब आज़माने के दिन आ रहे हैं
क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं
जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं
अभी से दिल-ओ-जाँ सर-ए-राह रख दो
के लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं
चलो "फ़ैज़" फिर से कहीं दिल लगायेँ
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
क़रीब उन के आने के दिन आ रहे हैं
जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है
सब उन को सुनाने के दिन आ रहे हैं
अभी से दिल-ओ-जाँ सर-ए-राह रख दो
के लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं
सबा फिर हमें पूछती फिर रही है
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं
चलो "फ़ैज़" फिर से कहीं दिल लगायेँ
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
लेबल:
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी
सुबह से श्याम तक बोझ ढाता हुआ
अपनी ही लाश पर खुद मजार आदमी
हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी
जिंदगी का मुकद्दर सफ़र दर सफ़र
आखरी सांस तक बेकरार आदमी
निदा फ़ाज़ली
फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी
सुबह से श्याम तक बोझ ढाता हुआ
अपनी ही लाश पर खुद मजार आदमी
हर तरफ़ भागते दौडते रास्ते
हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी
रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतजार आदमी
जिंदगी का मुकद्दर सफ़र दर सफ़र
आखरी सांस तक बेकरार आदमी
निदा फ़ाज़ली
दर्द अपनाता है पराये कौन
दर्द अपनाता है पराये कौन
कौन सुनता है और सुनाये कौन
कौन दोहराये वो पुरानी बात
ग़म अभी सोया है जगाये कौन
वो जो अपने है क्या वो अपने है
कौन दुख झेले आज़माये कौन
अब सुकूं है तो भूलने में है
लेकीन उस शख़्स को भुलाये कौन
आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आये कौन
जावेद अख़्तर.
कौन सुनता है और सुनाये कौन
कौन दोहराये वो पुरानी बात
ग़म अभी सोया है जगाये कौन
वो जो अपने है क्या वो अपने है
कौन दुख झेले आज़माये कौन
अब सुकूं है तो भूलने में है
लेकीन उस शख़्स को भुलाये कौन
आज फिर दिल है कुछ उदास उदास
देखिये आज याद आये कौन
जावेद अख़्तर.
इस से पहले के बेवफ़ा हो जाये
इस से पहले के बेवफ़ा हो जाये
क्यों ना ऐ दोस्त हम जुदा हो जाये
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल क्या से क्या हो जाये
हम भी मजबूरियों का उज़्र करे
और कहीं और मुबतला हो जाये
इश्क़ भी खेल हैं नसीबों का
ख़ाक हो जाये या किमिया हो जाये
अहमद फ़राज़.
आ भी जाओ की ज़िंदगी कम है
आ भी जाओ की ज़िंदगी कम है
तुम नहीं हो तो हर ख़ुशी कम है
वादा कर के ये कौन आया नहीं
शहर में आज रौशनी कम है
जाने क्या हो गया है मौसम को
धूप ज़ियादा है चांदनी कम है
आईना देख कर ख़याल आया
आज कल इनकी दोस्ती कम है
तेरे दम से ही मैं मुकम्मल हूं
बिन तेरे तेरी 'यामीनी' कम है.
यामीनी दास.
तुम नहीं हो तो हर ख़ुशी कम है
वादा कर के ये कौन आया नहीं
शहर में आज रौशनी कम है
जाने क्या हो गया है मौसम को
धूप ज़ियादा है चांदनी कम है
आईना देख कर ख़याल आया
आज कल इनकी दोस्ती कम है
तेरे दम से ही मैं मुकम्मल हूं
बिन तेरे तेरी 'यामीनी' कम है.
यामीनी दास.
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