हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते

तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

गुलज़ार

ख़याल-ओ-ख़्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी

ख़याल-ओ-ख़्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी
लहू में नाच रही हैं ये वहशतें कैसी

न शब को चांद हैं अच्छा न दिन को मेहर अच्छा
ये हम पे बीत रही हैं क़यामतें कैसी

अज़ाब जीन का तबस्सुम सवाब जिनकी निगाह
खिंची हुई हैं पस-ए-जानां सूरतें कैसी

हवा के दोश पे रक्खे हुए चिराग़ हैं हम
जो बुझ गये तो हवा से शिकायतें कैसी

जो बेख़बर कोई गुज़रा तो ये सदा दी है
मैं संग-ए-राह हू मुझ पर इनायतें कैसी

ओबैदुल्लाह अलीम

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।

डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ूँ जो जो चश्मे-तर से उम्र यूँ दम-ब-दम निकले ।

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत [1]दराज़ी[2]का
अगर उस तुर्रा-ए-पुर पेचो-ख़म[3] का पेचो-ख़म निकले

हुई जिनसे तवक़्क़ो[4]ख़स्तगी[5] दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़े-सितम[6] निकले

ज़रा कर ज़ोर सीने में कि तीरे-पुर-सितम[7] निकले
जो वो निकले तो दिल निकले ,जो दिल निकले तो दम निकले

मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाए
हुई सुबहऔर घर से कान पर धर कर क़लम निकले।

मुहब्बत में नही है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले ।

ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम,
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही पत्थर सनम निकले ।

कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़[8]
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

ग़ालिब

कामत=क़द
दराज़ी=ऊँचाई
पेचो-ख़म=बल खाए हुए तुर्रे का बल
तवक़्क़ो=चाहत
ख़स्तगी=घायलावस्था
ख़स्ता-ए-तेग़े-सितम=अत्याचार की तलवार के घायल
तीरे-पुर-सितम=अत्याचारपूर्ण तीर
वाइज़=उपदेशक

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
ये अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है

शहरयार

वो बुलायें तो क्या तमाशा हो

वो बुलायें तो क्या तमाशा हो
हम न जायें तो क्या तमाशा हो

ये किनारों से खेलने वाले
डूब जायें तो क्या तमाशा हो

बन्दापरवर जो हम पे गुज़री है
हम बतायें तो क्या तमाशा हो

आज हम भी तेरी वफ़ाओं पर
मुस्कुरायें तो क्या तमाशा हो

तेरी सूरत जो इत्तेफ़ाक़ से हम
भूल जायें तो क्या तमाशा हो

वक़्त की चन्द स'अतें 'साग़र'
लौट आयें तो क्या तमाशा हो

साग़र सिद्दीकी

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता

जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले
ये ऐसी आग है जिस में धुआँ नहीं मिलता

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
जहाँ उम्मीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

शहरयार

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ

न तो मैं किसी का हबीब हूँ न तो मैं किसी का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ

मेरा रंग-रूप बिगड़ गया मेरा यार मुझ से बिछड़ गया
जो चमन फ़िज़ाँ में उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ

पढ़े फ़ातेहा कोई आये क्यूँ कोई चार फूल चढाये क्यूँ
कोई आके शम्मा जलाये क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ

मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँफ़िशाँ मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुख की पुकार हूँ

मुज़्तर खैराबादी