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किसने वादा किया है आने का

किसने वादा किया है आने का
हुस्न देखो ग़रीबख़ाने का

रूह को आईना दिखाते हैं
दर-ओ-दीवार मुस्कुराते हैं

आज घर, घर बना है पहली बार
दिल में है ख़ुश सलीक़गी बेदार

जमा समाँ है ऐश-ओ-इश्रत का
ख़ौफ़ दिल में फ़रेब-ए-क़िस्मत का

सोज़-ए-क़ल्ब-ए-कलीम आँखों में
अश्क-ए-उम्मीद-ओ-बीम आँखों में

चश्म-बर-राह-ए-शौक़ के मारे
चाँद के इंतज़ार में तारे

जोश मलीहाबादी

ये दिन बहार के अब के भी रास न आ सके

ये दिन बहार के अब के भी रास न आ सके
कि ग़ुंचे खिल तो सके खिल के मुस्कुरा न सके

मेरी तबाही दिल पर तो रहम खा न सकी
जो रोशनी में रहे रोशनी को पा न सके

न जाने आह! कि उन आँसूओं पे क्या गुज़री
जो दिल से आँख तक आये मिश्गाँ तक आ न सके

रहें ख़ुलूस-ए-मुहब्बत के हादसात जहाँ
मुझे तो क्या मेरे नक़्श-ए-क़दम मिटा न सके

करेंगे मर के बक़ा-ए-दवाम क्या हासिल
जो ज़िंदा रह के मुक़ाम-ए-हयात पा न सके

नया ज़माना बनाने चले थे दीवाने
नई ज़मीं, नया आसमाँ बना न सके

जोश मलीहाबादी