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देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां

देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियां
हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियां

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तेरा उसूल मियां
हम क्यों छोड़ें इन गलियों के फेरों का मामूल मियां

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियां

अब तो हमें मंज़ूर है ये भी, शहर से निकलें रुसवा हों
तुझ को देखा, बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियां

इंशा जी क्या उज्र है तुमको, नक़्द-ए-दिल-ओ-जां नज़्र करो
रूपनगर के नाके पर ये लगता है महसूल मियां

इब्ने इंशा

(दश्त-ए-तलब: इच्छा का जंगल,
मामूल: दिनचर्या,
नाका: चुंगी,
महसूल: चुंगी पर वसूला जाने वाला टैक्स.)

कल चौदवी की रात थी

कल चौदवी की रात थी शब भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा ये चांद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा

हम भी वही मौजुद थे हम से भी सब पूछा किये
हम हंस दिये, हम चुप रहे,मंजूर था पर्दा तेरा

इस शहर में किससे मिले, हम से तो छूटी महफ़िले
हर शख्स तेरा नाम ले,हर शख्स दिवाना तेरा

कुचे को तेरे छोडकर जोगी ही बन जाये मगर
ज़ंगल तेरे, परबत तेरे,बस्ती तेरी,चेहरा तेरा

बेदर्द सुनी हो तो चल, कहता है क्या अच्छी गज़ल
आशिक़ तेरा, रूसवा तेरा,शायर तेरा,इंशा तेरा
इब्ने इंशा .