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ज़िंदगी तूने लहू लेके दिया कुछ भी नहीं

ज़िंदगी तूने लहू लेके दिया कुछ भी नहीं
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं

मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं

हमने देखा है कई ऐसे ख़ुदाओं को यहां
सामने जीन के वो सच मुच का खुदा कुछ भी नहीं

या ख़ुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार
जर्द ही ज़र्द है पेडों पे हरा कुछ भी नहीं

दिल भी इक जिद पे अडा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं

राजेश रेड्डी.

घर से निकले

घर से निकले थे हौसला करके
लौट आये खुदा खुदा करके

दर्द दिलका लगे वफ़ा करके
हमने देखा है तजुरबा करके

जिंदगी तो कभी नही आई
मौत आई जरा जरा करके

लोग सुनते रहे दिवार की बात
हम चले दिल को रहरूमा करके

किसने पाया सुकून दुनिया मे
जिन्दगानी का सामना करके

राजेश रेड्डी.