ज़िंदगी तूने लहू लेके दिया कुछ भी नहीं
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं
मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं
हमने देखा है कई ऐसे ख़ुदाओं को यहां
सामने जीन के वो सच मुच का खुदा कुछ भी नहीं
या ख़ुदा अब के ये किस रंग से आई है बहार
जर्द ही ज़र्द है पेडों पे हरा कुछ भी नहीं
दिल भी इक जिद पे अडा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं
राजेश रेड्डी.
उर्दु साहित्य में ग़ज़लों का अपना एक अलग ही महत्त्व हैं। ग़ज़लें जीवन के हर पहलू को स्पर्श करती आई है। चाहे वो ख़ुशी हो या ग़म, प्यार हो या शिकवा गिला, यारी हो या दुश्मनी, जीवन के हर भाव को अपने शब्दों में बयाँ करती है ग़ज़लें। यहाँ उर्दु तथा हिन्दी के कुछ जाने माने साहित्यकारों की रचनाओं को आप तक पहुँचाने कि एक कोशिश करना चाह रहा हूँ। आशा है आप इसे बढ़ाने में अपनी राय एवं अपना योगदान ज़रूर देंगे।
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घर से निकले
घर से निकले थे हौसला करके
लौट आये खुदा खुदा करके
दर्द दिलका लगे वफ़ा करके
हमने देखा है तजुरबा करके
जिंदगी तो कभी नही आई
मौत आई जरा जरा करके
लोग सुनते रहे दिवार की बात
हम चले दिल को रहरूमा करके
किसने पाया सुकून दुनिया मे
जिन्दगानी का सामना करके
राजेश रेड्डी.
लौट आये खुदा खुदा करके
दर्द दिलका लगे वफ़ा करके
हमने देखा है तजुरबा करके
जिंदगी तो कभी नही आई
मौत आई जरा जरा करके
लोग सुनते रहे दिवार की बात
हम चले दिल को रहरूमा करके
किसने पाया सुकून दुनिया मे
जिन्दगानी का सामना करके
राजेश रेड्डी.
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