हम उन्हें वो हमें भुला बैठे


हम उन्हें वो हमें भुला बैठे
दो गुनहगार ज़हर खा बैठे|

हाल--ग़म कह-कह के ग़म बढ़ा बैठे
तीर मारे थे तीर खा बैठे|

आंधियो जाओ अब आराम करो
हम ख़ुद अपना दिया बुझा बैठे|

जी तो हल्का हुआ मगर यारो
रो के हम लुत्फ़--गम बढ़ा बैठे|

बेसहारों का हौसला ही क्या
घर में घबराए दर पे बैठे|

जब से बिछड़े वो मुस्कुराए हम
सब ने छेड़ा तो लब हिला बैठे|

उठ के इक बेवफ़ा ने दे दी जान
रह गए सारे बावफ़ा बैठे|

हश्र का दिन है अभी दूर 'ख़ुमार'
आप क्यों जाहिदों में जा बैठे|

ख़ुमार बाराबंकवी
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हर तरफ़ अपने को बिखरा पाओगे

हर तरफ़ अपने को बिखरा पाओगे,
आईनों को तोड के पछताओगे।

जब बदी के फूल महकेंगे यहाँ,
नेकियों पर अपने तुम शरमाओगे।

सच को पहले लफ़्ज फिर लब देंगे हम,
तुम हमेशा झूठ को झूठलाओगे।

सारी सिमते बेकशिश हो जायेगी,
घूम फिर के फिर यही आ जाओगे।

रूह की दीवार के गिरने के बाद,
बे बदन हो जाओगे, मर जाओगे।

शहरयार।

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नही मिलता तो हाथ भी न मिला

घरों पे नाम थे, नाम के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया, कोई आदमी न मिला

तमाम रिश्तों को घर पे छोड आया था
फ़िर उसके बाद मुझे कोई अजनबी न मिला

बहुत अजीब है ये गुरबतों की दूरी भी
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला

बशीर बद्र

काश! ऐसा कोई मंज़र होता

काश ऐसा कोई मंज़र होता
मेरे कांधे पे तेरा सर होता

जमा करता जो मैं आये हुये संग
सर छुपाने के लिये घर होता

इस बुलंदी पे बहुत तनहा हू
काश मैं सबके बराबर होता

उस ने उलझा दिया दुनिया में मुझे
वरना इक और क़लंदर होता

ताहिर फ़राज़

हर एक रूह में

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे
ये जिंदगी तो कोई बददुआ लगे है मुझे

न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है?
कभी कभी तो बडा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे

अब एक-आध कदम का हिसाब क्या रखे?
अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझ

दबाके आई है सिने में कौन सी आहें
कुछ आज रंग तेरा सांवला लगे है मुझे



जाँ निसार अख़्तर

किसने वादा किया है आने का

किसने वादा किया है आने का
हुस्न देखो ग़रीबख़ाने का

रूह को आईना दिखाते हैं
दर-ओ-दीवार मुस्कुराते हैं

आज घर, घर बना है पहली बार
दिल में है ख़ुश सलीक़गी बेदार

जमा समाँ है ऐश-ओ-इश्रत का
ख़ौफ़ दिल में फ़रेब-ए-क़िस्मत का

सोज़-ए-क़ल्ब-ए-कलीम आँखों में
अश्क-ए-उम्मीद-ओ-बीम आँखों में

चश्म-बर-राह-ए-शौक़ के मारे
चाँद के इंतज़ार में तारे

जोश मलीहाबादी

जो भी मिल जाता है घर बार को दे देता हूँ।

जो भी मिल जाता है घर बार को दे देता हूँ।
या किसी और तलबगार को दे देता हूँ।

धूप को दे देता हूँ तन अपना झुलसने के लिये
और साया किसी दीवार को दे देता हूँ।

जो दुआ अपने लिये मांगनी होती है मुझे
वो दुआ भी किसी ग़मख़ार को दे देता हूँ।

मुतमइन अब भी अगर कोई नहीं है, न सही
हक़ तो मैं पहले ही हक़दार को दे देता हूँ।

जब भी लिखता हूँ मैं अफ़साना यही होता है
अपना सब कुछ किसी किरदार को दे देता हूँ।

ख़ुद को कर देता हूँ कागज़ के हवाले अक्सर
अपना चेहरा कभी अख़बार को देता हूँ ।

मेरी दुकान की चीजें नहीं बिकती नज़्मी
इतनी तफ़सील ख़रीदार को दे देता हूँ।

अख़्तर नाज़्मी