उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँढने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ

मेहरबाँ होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ

डाल कर ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी के मिटा भी न सकूँ

ज़ब्त कमबख़्त ने और आ के गला घोंटा है
के उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ

ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना
क्या कसम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूँ

उस के पहलू में जो ले जा के सुला दूँ दिल को
नींद ऐसी उसे आए के जगा भी न सकूँ

नक्श-ऐ-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सजदे
सर मेरा अर्श नहीं है कि झुका भी न सकूँ

बेवफ़ा लिखते हैं वो अपनी कलम से मुझ को
ये वो किस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ

इस तरह सोये हैं सर रख के मेरे जानों पर
अपनी सोई हुई किस्मत को जगा भी न सकूँ

अमीर मीनाई

शब्दार्थ:
हसरत-इच्छा
ज़ब्त-सहनशीलता
पहलू-गोद
अर्श-आसमान

जिस में लाखों बरस की हूरें हों, ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

आरजू है वफ़ा करे कोई
जी न चाहे तो क्या करे कोई

गर मर्ज़ हो दवा करे कोई
मरने वाले का क्या करे कोई

कोसते हैं जले हुए क्या क्या
अपने हक़ में दुआ करे कोई

उन से सब अपनी अपनी कहते हैं
मेरा मतलब अदा करे कोई

तुम सरापा हो सूरत-ए-तस्वीर
तुम से फिर बात क्या करे कोई

जिस में लाखों बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई

दाग़ देहलवी

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन
ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा
जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते

तूने आवाज़ नहीं दी कभी मुड़कर वरना
हम कई सदियाँ तुझे घूम के देखा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो
ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

गुलज़ार

ख़याल-ओ-ख़्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी

ख़याल-ओ-ख़्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी
लहू में नाच रही हैं ये वहशतें कैसी

न शब को चांद हैं अच्छा न दिन को मेहर अच्छा
ये हम पे बीत रही हैं क़यामतें कैसी

अज़ाब जीन का तबस्सुम सवाब जिनकी निगाह
खिंची हुई हैं पस-ए-जानां सूरतें कैसी

हवा के दोश पे रक्खे हुए चिराग़ हैं हम
जो बुझ गये तो हवा से शिकायतें कैसी

जो बेख़बर कोई गुज़रा तो ये सदा दी है
मैं संग-ए-राह हू मुझ पर इनायतें कैसी

ओबैदुल्लाह अलीम

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ।

डरे क्यों मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो ख़ूँ जो जो चश्मे-तर से उम्र यूँ दम-ब-दम निकले ।

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन,
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले ।

भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे कामत [1]दराज़ी[2]का
अगर उस तुर्रा-ए-पुर पेचो-ख़म[3] का पेचो-ख़म निकले

हुई जिनसे तवक़्क़ो[4]ख़स्तगी[5] दाद पाने की
वो हम से भी ज़ियादा ख़स्ता-ए-तेग़े-सितम[6] निकले

ज़रा कर ज़ोर सीने में कि तीरे-पुर-सितम[7] निकले
जो वो निकले तो दिल निकले ,जो दिल निकले तो दम निकले

मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाए
हुई सुबहऔर घर से कान पर धर कर क़लम निकले।

मुहब्बत में नही है फ़र्क़ जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले ।

ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे से उठा ज़ालिम,
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही पत्थर सनम निकले ।

कहाँ मैख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़[8]
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था के हम निकले।

ग़ालिब

कामत=क़द
दराज़ी=ऊँचाई
पेचो-ख़म=बल खाए हुए तुर्रे का बल
तवक़्क़ो=चाहत
ख़स्तगी=घायलावस्था
ख़स्ता-ए-तेग़े-सितम=अत्याचार की तलवार के घायल
तीरे-पुर-सितम=अत्याचारपूर्ण तीर
वाइज़=उपदेशक

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है

ज़िन्दगी जैसी तमन्ना थी नहीं कुछ कम है
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है

घर की तामीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है

बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फिर होगी
दिल में उम्मीद तो काफ़ी है यक़ीं कुछ कम है

अब जिधर देखिये लगता है कि इस दुनिया में
कहीं कुछ चीज़ ज़ियादा है कहीं कुछ कम है

आज भी है तेरी दूरी ही उदासी का सबब
ये अलग बात कि पहली सी नहीं कुछ कम है

शहरयार

वो बुलायें तो क्या तमाशा हो

वो बुलायें तो क्या तमाशा हो
हम न जायें तो क्या तमाशा हो

ये किनारों से खेलने वाले
डूब जायें तो क्या तमाशा हो

बन्दापरवर जो हम पे गुज़री है
हम बतायें तो क्या तमाशा हो

आज हम भी तेरी वफ़ाओं पर
मुस्कुरायें तो क्या तमाशा हो

तेरी सूरत जो इत्तेफ़ाक़ से हम
भूल जायें तो क्या तमाशा हो

वक़्त की चन्द स'अतें 'साग़र'
लौट आयें तो क्या तमाशा हो

साग़र सिद्दीकी