कितनी पलकों की नमी मांगके लाई होगी
प्यास तब फूल की शबनम ने बुझाई होगी
इक सितारा जो गिरा टूंट के उंचाई से
किसी जर्रे की हंसी उसने उडाई होगी
आंधिया हैं के मचलती है,चली आती है
किसी मुफ़लीस ने कही शम्मा जलाई होगी
मैनें कुछ तुमसे कहा हो तो जबां जल जाये
किसी दुश्मन ने ये अफ़वाह उडाई होगी
हम तो आहट के भरोसे पे सहर तक पहुंचे
रातभर आपको भी नींद ना आई होगी
Saturday, April 29, 2006
जब कभी तेरा नाम लेते है
जब कभी तेरा नाम लेते है
दिल से हम इंतिकाम लेते है
मेरे बरबादियों के अफ़साने
मेरे यारों के नाम लेते है
बस यही एक जुल्म है अपना
हम मोहब्बत से काम लेते है
हर कदम पर गिरे मगर सिखा
कैसे गिरतों को थाम लेते है
हम भटककर जुनूं की राहों मे
अक्ल से इंतिकाम लेते है
सरदार अंजुम
दिल से हम इंतिकाम लेते है
मेरे बरबादियों के अफ़साने
मेरे यारों के नाम लेते है
बस यही एक जुल्म है अपना
हम मोहब्बत से काम लेते है
हर कदम पर गिरे मगर सिखा
कैसे गिरतों को थाम लेते है
हम भटककर जुनूं की राहों मे
अक्ल से इंतिकाम लेते है
सरदार अंजुम
पूरा दुख और आधा चांद
पूरा दुख और आधा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चांद
मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद
सहरा सहरा भटक रहा है
परवीन शाकिर
अपने इश्क मे सच्चा चांद
रात के शायद एक बजे है
सोता होगा मेरा चांद
हिज्र की शब और ऐसा चांद
इतने घने बादल के पीछे
कितना तनहा होगा चांद
मेरी करवट पर जाग उठे
नींद का कितना कच्चा चांद
सहरा सहरा भटक रहा है
परवीन शाकिर
अपने इश्क मे सच्चा चांद
रात के शायद एक बजे है
सोता होगा मेरा चांद
Thursday, April 20, 2006
जिंदगी से बडी सजा ही नहीं
जिंदगी से बडी सजा ही नहीं
और क्या जुल्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बंट गया हूं मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
सच घटे या बढे तो सच ना रहे
झूठ की तो कोई इम्तिहां ही नहीं
जड दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नहीं
कृष्णबिहारी नूर.
और क्या जुल्म है पता ही नहीं
इतने हिस्सों में बंट गया हूं मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं
सच घटे या बढे तो सच ना रहे
झूठ की तो कोई इम्तिहां ही नहीं
जड दो चांदी में चाहे सोने में
आईना झूठ बोलता ही नहीं
कृष्णबिहारी नूर.
झूम ले हस बोल ले
झूम ले हस बोल ले प्यारी अगर है जिंदगी
सांस के बस एक झोके का सफ़र है जिंदगी
देर ही बनते बिगडते कुछ इसे लगती नही
फूल के दिवार पर शबनम का घर है जिंदगी
अजनबी हालात से भी हंसके मिलना चाहिये
हर कदम पर मुडने वाली रहगुजर है जिंदगी
जिंदगी मे जो भी करना चाहता है कर गुजर
क्या खबर बरसो की है या लम्हाभर है जिंदगी
सांस के बस एक झोके का सफ़र है जिंदगी
देर ही बनते बिगडते कुछ इसे लगती नही
फूल के दिवार पर शबनम का घर है जिंदगी
अजनबी हालात से भी हंसके मिलना चाहिये
हर कदम पर मुडने वाली रहगुजर है जिंदगी
जिंदगी मे जो भी करना चाहता है कर गुजर
क्या खबर बरसो की है या लम्हाभर है जिंदगी
तुम सरे आम
तुम सरे आम मुलाकात से डरते क्यो हो
इश्क करते हो तो हालात से डरते क्यो हो
ये बताओ तो जरा मेरा खयाल आते ही
दिन से घबराते हो तुम रात से डरते क्यो हो
तुम तो कहते हो तुम्हे मुझसे मोहब्बत ही नही
फिर जुदाई के खयालात से डरते क्यो हो
मुझसे खुद आके लिपट जाना संभलकर हटना
तेज होती हुई बरसात से डरते क्यो हो
जमीर काजमी.
इश्क करते हो तो हालात से डरते क्यो हो
ये बताओ तो जरा मेरा खयाल आते ही
दिन से घबराते हो तुम रात से डरते क्यो हो
तुम तो कहते हो तुम्हे मुझसे मोहब्बत ही नही
फिर जुदाई के खयालात से डरते क्यो हो
मुझसे खुद आके लिपट जाना संभलकर हटना
तेज होती हुई बरसात से डरते क्यो हो
जमीर काजमी.
Sunday, April 16, 2006
कोई पत्ता हिले
कोई पत्ता हिले हवा तो चले
कौन अपना है ये पता तो
चले तू सितम से न हाथ अभी
और कुछ दिन ये सिलसिला तो चले
मंजिले खुद करीब आयेंगी
ये अजिजानो का काफ़िला तो चले
शहर हो गाव हो या हो घर अपना
आबुदाना ही उठ गया तो चले
हर किसी से मिला करो ए जफ़र
कौन कैसा है कुछ पता तो चले
जफ़र अली.
कौन अपना है ये पता तो
चले तू सितम से न हाथ अभी
और कुछ दिन ये सिलसिला तो चले
मंजिले खुद करीब आयेंगी
ये अजिजानो का काफ़िला तो चले
शहर हो गाव हो या हो घर अपना
आबुदाना ही उठ गया तो चले
हर किसी से मिला करो ए जफ़र
कौन कैसा है कुछ पता तो चले
जफ़र अली.
घर से निकले
घर से निकले थे हौसला करके
लौट आये खुदा खुदा करके
दर्द दिलका लगे वफ़ा करके
हमने देखा है तजुरबा करके
जिंदगी तो कभी नही आई
मौत आई जरा जरा करके
लोग सुनते रहे दिवार की बात
हम चले दिल को रहरूमा करके
किसने पाया सुकून दुनिया मे
जिन्दगानी का सामना करके
राजेश रेड्डी.
लौट आये खुदा खुदा करके
दर्द दिलका लगे वफ़ा करके
हमने देखा है तजुरबा करके
जिंदगी तो कभी नही आई
मौत आई जरा जरा करके
लोग सुनते रहे दिवार की बात
हम चले दिल को रहरूमा करके
किसने पाया सुकून दुनिया मे
जिन्दगानी का सामना करके
राजेश रेड्डी.
Friday, April 07, 2006
गजल की दुनिया में
मुस्कुराकर मिला करो हमसे
कुछ कहा और सुना करो हमसे
बात करने से बात बढती है
रोज बाते किया करो हमसे
दुश्मनी से मिलेगा क्या तुमको
दोस्त बनकर रहा करो हमसे
कुछ कहा और सुना करो हमसे
बात करने से बात बढती है
रोज बाते किया करो हमसे
दुश्मनी से मिलेगा क्या तुमको
दोस्त बनकर रहा करो हमसे
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